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Sunday, December 12, 2010

मोबाइल टॉवर सीलिंग से उपभोक्ता हलाकान


बोलने से बच रहीं मोबाइल कंपनियां
पहले भी चली थी सीलिंग कार्रवाई
मोबाइल कंपनियों और नगर निगम के बीच जारी रस्साकशी का खामियाजा उपभोक्ताओं को भुगतान पड़ रहा है। तीन दिन से अवैध मोबाइल टॉवरों के खिलाफ जारी कार्रवाई से कार्य कर रहे टॉवरों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। उल्लेखनीय है कि एक टॉवर से पांच हजार मोबाइल कनेक्शन जुड़े होते हैं, चिन्हित किए गए अवैध टावरों की संख्या 150 से अधिक होने के कारण स्थिति गंभीर बनी हुई है। इससे पहले फरवरी में भी निगम ने मोबाइल कंपनियों के अवैध टॉवरों के खिलाफ अभियान चलाया था। निर्धारित मानकों को अनदेखा कर कंपनियां कहीं भी अपने टॉवर लगा देती हैं, साथ ही सुरक्षा निर्देशों का भी ठीक से पालन नहीं किया जाता।
इस होड़ में प्रायवेट मोबाइल कंपनियां ही नहीं, बल्कि सरकारी कंपनी बीएसएनल ने भी आवश्यक दिशा-निर्देशों की धाियां उड़ायी है। आम उपभोक्ताओं को होने वाली परेशानी का हवाला देकर जब एक निजी मोबाइल कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी से सम्पर्क साधा गया तो उन्होंने सीधी जानकारी देने से बचते हुए इस संबंध में अपने क्षेत्रीय कार्यालय से जानकारी मंगाने की बात कहकर पल्ला झाड़ लिया। वहीं जानकारों का मानना है कि इस कार्रवाई से टेलीकॉम कंपनियों में हड़कम्प मचा हुआ है। स्थिति सामान्य होने में अभी कितना वक्त लगेगा, मोबाइल उपभोक्ताओं की दिक्कतें फिलहाल बढ़ गई हैं। संतोषी नगर निवासी संतोष गुप्ता ने बताया कि उनके इलाके में सिग्नल कभी-कभी बिल्कुल ही गायब हो जाता है, जिससे उनको बात करने में काफी दिक्कत हो रही है। ऐसी ही स्थिति बहुत से अन्य मोबाइल उपभोक्ताओं की भी है।



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Saturday, December 11, 2010

भारत को मिलेगा सबसे घातक बम


जल्दी ही भारतीय वायुसेना को दुनिया के सबसे घातक बमों में से एक क्लस्टर बम हासिल हो जाएंगे। अमरीकी प्रशासन के मुताबिक, उसने भारत को 512 सीबीयू-195 बमों की बिक्री के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी है।

अमरीका की टैक्सट्रॉन सिस्टम्स कॉर्पोरेशन के साथ भारत का करीब 26 करोड़ डॉलर का रक्षा सौदा हुआ है। यह सौदा अमरीका के फॉरेन मिलिट्री सेल्स (एफएमएस) प्रोग्राम के तहत हुआ।

वर्ष 2003 में इराक युद्ध के दौरान क्लस्टर बमों की क्षमता का परीक्षण हो चुका है।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय वायुसेना इन बमों का इस्तेमाल सुखोई एसयू-30 एमकेआई में कर सकती है। इन बमों की बिक्री के लिए भारत ने पहली बार 2008 में आग्रह किया था। भारत को इन बमों की बिक्री का समर्थन पेंटागन (अमरीकी रक्षा मुख्यालय) ने भी किया था। उसकी ओर से अमरीकी कांग्रेस को बताया गया था कि इन बमों से भारत की रक्षा क्षमता में वृद्धि होगी। युद्ध के दौरान जमीन पर बख्तरबंद वाहनों, टैकों आदि को भारत प्रभावी तरीके नष्ट कर सकता है।


आधे टन वजनी क्लस्टर बम
एक क्लस्टर बम का आधा टन तक होता है। इसका संचालन पूरी तरह कंप्यूटर से नियंत्रित होता है। इन बमों में सक्रिय लेजर सेंसर होते हैं। एक क्लस्टर बम से जमीन पर फिक्स या मूविंग कई लक्ष्यों को एक साथ भेदा जा सकता है। इन बमों के लिए जो वारहैड्स अमरीका भारत को दे रहा है, वे एक बार में 10 बम दाग सकते हैं। इनके वारहैड्स पर राडार लगे होते हैं जो सटीक लक्ष्य भेदने में मददगार होते हैं।

रक्षा परिवहन विमान 16 को मिलेगा
भारत को पहला स्टेट ऑफ द आर्ट सी-130 जे रक्षा परिवहन विमान 16 दिसंबर को मिल जाएगा। इस विमान की निर्माता कंपनी लॉकहीड मार्टिन की ओर से वाशिंगटन में जारी बयान में यह जानकारी दी गई। बयान के मुताबिक, पहले दो विमान 2011 की शुरुआत में, अगले दो गर्मियों की शुरुआत में और शेष दो विमान गर्मियों के अंत तक अगले साल भेज दिए जाएंगे।


Thursday, December 9, 2010

ई-बैंकिंग : लापरवाही पड़ रही भारी



रायपुर में ई बैंकिंग के जरिये डेढ़ लाख रुपये की ठगी के अहम् खुलासे के बाद बैंक ग्राहकों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गयी हैं. बैंकिंग सुविधाओं में सबसे अधिक प्रचलन डेबिट कार्ड का है, ज़रा सी भी लापरवाही से इसमें जोखिम की संभावना सबसे अधिक रहती है, इसे संभाल कर रखने की जिम्मेदारी उपयोगकर्ताओं की है. राजधानी के 120 से अधिक एटीएम में भी आप उच्च सुरक्षा नियमों का पालन करके अपनी मेहनत की कमाई को डूबने से बचा सकते हैं .

ई-बैंकिंग के जरिए धोखाधड़ी के अहम् खुलासे के बाद उन बैंक ग्राहकों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं, जो ऑनलाइन बैंकिंग सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं। बैंकिंग सुविधाओं में सबसे ज्यादा प्रचलन एटीएम कार्ड का है, इसलिए जरा सी लापरवाही में इसमें जोखिम की सम्भावना अधिक रहती है। जहां एक ओर यह एक सुविधा है, वहीं दूसरी तरफ इसे सम्भालकर प्रयोग करने की जिम्मेदारी ग्राहकों पर है।
इन दिनों एटीएम कार्ड से जुड़ी कई प्रकार की घटनाएं सामने आ रही हैं, जिसमें जालसाज ग्राहकों की कम जानकारी का फायदा उठाकर उनके खातों में जमा रकम डकार रहे हैं। राजधानी में विभिन्न बैंकों के 120 से अधिक एटीएम मशीन है, जिनमें न्यूनतम सुरक्षा जैसे गुप्त कैमरा, गार्ड आदि की सुविधा होने के बावजूद लोग अपने खातों की सुरक्षा हेतु आश्वस्त नहीं हैं, क्योंकि एटीएम मशीन के साथ यह डेबिट कार्ड के तौर पर भी इस्तेमाल हो रहे हैं जिसमें बिना नकदी आहरण किए खरीददारी की जा सकती है। मशीन की गड़बड़ी या अपनी स्वयं की लापरवाही की वजह से भी उपयोगकर्ताओं को परेशान होना पड़ता है।
भारतीय स्टेट बैंक के एक अधिकारी के मुताबिक एटीएम का प्रयोग करते समय अगर कुछ सावधानियां बरती जाएं तो इसके गलत इस्तेमाल से बचा जा सकता है, क्योंकि रकम डूबने के बाद शिकायत करने पर भी बैंक किसी प्रकार की ठोस मदद करने की स्थिति में नहीं होते। एटीएम प्रयोग करते समय यह जांच लें कि कोई आपका पिन नम्बर न देख रहा हो, कार्ड विवरण जैसे कार्ड नम्बर और सीवीवी नम्बर किसी अन्य को न बताएं। कुछ मशीनों में कार्ड डालने की जगह उसको स्वाइप कराना होता है, ऐसी मशीनें अक्सर ट्रान्जैक्शन पूरा करने के बाद अगले लेन-देन के बारे में पूछती हैं जिसे 'नहीं' दबाकर पूरा करें। अगर आप अपने एटीएम कम-डेबिट कार्ड से खरीददारी कर रहे हैं तो यह ध्यान रखें कि आपके कार्ड को एक बार से अधिक स्वाइप न किया जाए। अगर ऐसा होता है तो इसकी जानकारी लेते हुए रसीद जरूर प्राप्त करें। कार्ड को अपनी नजर में ही रखें क्योंकि हो सकता है आपके द्वारा दी गई जानकारी का कोई दूसरा इस्तेमाल कर ले। कार्ड के पीछे सीवीवी नम्बर होता, इसको अपने पास सुरक्षित लिखकर इसे कार्ड से मिटा दें। तीन अंकों का सीवीवी बहुत अहम् होता है, इसकी मदद से आपकी जानकारी और कार्ड के बगैर भी कोई इंटरनेट से खरीददारी कर सकता है। शहर में अब तक घटी घटनाओं में से अधिकतर को इंटरनेट के माध्यम से ही अंजाम दिया गया है। जहां तक सम्भव हो साईबर कैफे का इस्तेमाल ऑनलाइन पेमेन्ट हेतु न करें, क्योंकि वहां से आपके निजी विवरण लीक होने का खतरा सबसे अधिक होता है। कार्ड खो जाने पर संबंधित बैंक शाखा या ग्राहक सेवा केन्द्र जाकर अपना कार्ड तुरन्त बंद करा दें, इसकी सूचना पुलिस को भी दी जा सकती है।

Wednesday, December 8, 2010

हवाई किराए में बढ़ोत्तरी, मनेगा नए साल का जश्न


नए वर्ष के आगमन में कुछ ही दिनों का समय शेष रह गया है, इसलिए 31 दिसम्बर की रात का जश्न मनाने के लिए अभी से लोग सैर-सपाटे की तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुट गए हैं। राजधानी से ज्यादातर लोग मुम्बई, केरल, गोवा व कर्नाटक जाने के लिए बुकिंग करवा चुके हैं। लोगों का उत्साह भांप हवाई किराया में तीस से चालीस फीसदी की वृध्दि हो गई है, साथ ही ज्यादातर ट्रेनों में सीटें भर गई हैं। ट्रैवल एजेंसियाँ ग्राहकों के हिसाब से कई टूरिज्म पैकेज लाकर उन्हें आकर्षित कर रही हैं।

राजधानी रायपुर के बाशिंदे नए साल का जश् मनाने के लिए घरेलू पर्यटक केंद्रों में जाकर नववर्ष का स्वागत करने की तैयारी कर चुके हैं। समता कॉलोनी के राजेश सिन्हा इस बार अपने परिवार के साथ एक हफ्ते के लिए केरल जाने की बात करते हुए कहते हैं कि हमने जश् को यादगार बनाने की पूरी तैयारी कर ली है, अब बस निकलने की देर है। विभिन्न शहरों के लिए हवाई किराए में भी वृध्दि हुई है। मुम्बई के लिए आम दिनों में हवाई किराया चार हजार रुपए तक रहता था, जो अब 5000 रु. से ऊपर निकल गया है। घड़ी चौक स्थित ट्रैवल एजेंसी संचालक ने बताया कि उनके यहां से लोगों ने अधिकतर मुम्बई और गोवा के लिए बुकिंग कराई है, जबकि कुछ ने केरल, मनाली और हैदराबाद की भी टिकटें खरीदी हैं।

Tuesday, December 7, 2010

धड़ल्ले से जारी है नकली सीडी का कारोबार




राजधानी में इन दिनों पायरेटेड सीडी का धंधा जोरों पर है। नई फिल्म रिलीज हुई नहीं कि उसकी सीडी बाजारों में आसानी से उपलब्ध हो जाती है। एक फिल्म निर्माता जितना फिल्म बनाकर कमाता है, उससे कहीं ज्यादा कमाई नकली डीवीडी-सीडी बनाने वाले कर रहे हैं। इससे न केवल फिल्म व्यवसाय से जुड़े लोगों का नुकसान हो रहा है, बल्कि सरकार को भी करोड़ों रुपए के राजस्व की हानि हो रही है। लचर कानून व सख्त कार्रवाई के अभाव में इस धंधे से छोटे कारोबारी भी जुड़ चुके हैं, स्थिति यह है कि 150 से 200 रुपए तक मूल्य में मिलने वाली फिल्मों की डीवीडी कॉपी करके 20-25 रुपए में शहर के ठेलों में खुलेआम बिक रही है।
तेजी से पांव पसार रहा पायरेसी का व्यवसाय मनोरंजन उद्योग के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है। छत्तीसगढ़ का फिल्मोद्योग भी पायरेसी के रोग से अछूता नहीं है। छत्तीसगढ़िया फिल्मोद्योग से जुड़े मोहन सुंदरानी कहते हैं कि पायरेसी का यह नेटवर्क राजधानी ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में फैला हुआ है। इससे निपटने के लिए छोटी-मोटी कार्रवाई से काम नहीं चलने वाला। वह मानते हैं कि इसके पीछे कोई बड़ा रैकेट काम कर रहा है और अगर पुलिस गंभीरता से पड़ताल करे तो एक सप्ताह के भीतर ही इसकी सभी परतें खुल सकती हैं।
उल्लेखनीय है कि शहर में ओरिजनल सीडी बेचने वाली सिर्फ 4-5 दुकानें ही हैं। आमापारा स्थित एक सीडी विक्रेता ने बताया कि असली डीवीडी महंगी होने के कारण लोगों का रूझान सस्ती पायरेटेड कॉपी पर अधिक रहता है, क्योंकि यह 20 से 25 रुपए में उपलब्ध होने के साथ इसमें पांच से छ: फिल्में भी होती हैं।
ऐसा नहीं है कि पुलिस ने कभी छापेमारी नहीं की। शहर के कई ठिकानों में शिकायत के आधार पर कई बार दबिशें दी गई हैं, लेकिन सीमित कार्रवाई के चलते आरोपी अक्सर बच निकलते हैं और वापस अपने धंधे में लग जाते हैं। हर महीने करोड़ों के टर्न ओवर तक पहुंच चुके पायरेसी के धंधेबाजों को पकड़ने में आमतौर पर पुलिस गंभीर नहीं होती। कई बार म्युजिक कंपनियां जब शिकायत करती हैं तो छापा मार दिया जाता है। मौके पर मिले माल को जब्त किया जाता है, लेकिन कारोबार की जड़ में जाने और बड़ी मछलियों को पकड़ने की पुलिस ने कभी कोशिश नहीं की। पायरेसी नेटवर्क को तोड़ने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाए जाने की आवश्यकता है, साथ ही सरकार को भी समस्या की सुध लेनी चाहिए। क्योंकि उसे भी करोड़ों के राजस्व का घाटा उठाना पड़ रहा है।
शहर में पायरेटेड सीडी के फुटकर विक्रेताओं की यूं तो हर जगह भरमार है, लेकिन घड़ी चौक, जयस्तम्भ चौक, जेल रोड, महाबो बाजार, पंडरी, तेलीबांधा, पचपेढ़ी नाका, आमापारा, सदर बाजार, के अलावा लगभग सभी चौराहों में ठेलों में सजाकर इनकी खुलेआम बिक्री की जा रही है। सरेआम जिस तरह कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन किया जा रहा है, उसमें प्रशासनिक चुप्पी हैरत करने वाली है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक वह सिर्फ शिकायत के आधार पर ही कार्रवाई कर सकते ह,ैं लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि इस संज्ञेय अपराध में किसकी शिकायत का इंतजार है। राजधानी होने के कारण यहां वीआईपी मूवमेंट भी अधिक रहता है, उसके बावजूद शासन-प्रशासन के लोगों की चुप्पी पायरेसी के धंधे को मौन सहमति दे रही है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे मामलों में पुलिस स्वयं कार्रवाई कर सकती है। कॉपी राइट एक्ट के तहत दर्ज किए गए मामले में तीन साल की सजा और बीस हजार रुपए जुर्माने का प्रावधान है। यह संज्ञेय अपराध है इसलिए पुलिस को बिना मजिस्ट्रेट से आदेश लिए आरोपी को गिरफ्तार करने का अधिकार है, लेकिन इस कानून में इतने अधिक पेंच हैं कि आमतौर पर आरोपी बच निकलता है।


कैसे चल रहा है धंधा
फिल्म कंपनियों ने सिनेमा हॉल में दर्शकों को खींचने के लिए फिल्म के साथ सीडी रिलीज करनी बंद कर दी है। फिल्म निर्माता अपने विदेशी अधिकारों को बेच देते हैं और वहां फिल्में पहले रिलीज हो जाती हैं। साथ ही सीडी भी रिलीज की जाती है। सीडी रिलीज होते ही यह आसानी से पाकिस्तान होते हुए भारत पहुंचती है। इस काम में अन्डरवर्ल्ड के लोग भी शामिल हैं। दूसरा लैब में फिल्मों के निगेटिव तैयार करते समय उसकी कॉपी कर लेते हैं, फिर इस मास्टर प्रिन्ट की मदद से करोड़ों सीडी तैयार कर ली जाती है। छत्तीसगढ़ में माल दिल्ली व मुंबई के बाजारों से आता है।

बड़ी कार्रवाई की जरूरत
रणनीति के तहत अभियान चलाकर पायरेसी के खिलाफ सख्त मुहिम छेड़ने पर ही इस पर रोक लग सकती है, क्योंकि मर्ज इतना बढ़ गया है कि छिटपुट कार्रवाईयों से कुछ नहीं होने वाला।

दक्षिण भारत के राज्यों में सख्ती
एक अनुमान के मुताबिक फिल्म जितनी कमाई करती है उसका दस गुना पायरेसी से जुड़े लोग कमा रहे हैं। जानकार मानते हैं कि छत्तीसगढ़ में दक्षिण भारत की तर्ज पर सख्त कार्रवाई करते हुए आरोपियों पर गुंडा एक्ट लगाना चाहिए, जिससे आरोपी छह महीनों तक जेल में ही रहें। कॉपीराइट एक्ट को भी सख्त बनाए जाने की तुरंत आवश्यकता है, साथ ही सरकार की भी जिम्मेदारी है कि पायरेसी करने वालों से सख्ती से निपटे।

जनता भी आगे आएं
अगर आप सड़क किनारे या अवैध ढंग से बिकने वाली सीडी, डीवीडी की सूचना देना चाहते हैं तो इस नम्बर 18001031919 पर दे सकते हैं।

Sunday, November 14, 2010

हाथी समस्या: जस की तस


छत्तीसगढ़ में जंगली हाथियों का आतंक

छत्तीसगढ़ में हाथी आतंक और तबाही का पर्याय बन चुके हैं। पिछले दो दशकों के दौरान हाथियों ने राज्य में 120 से ज्यादा लोगों की जान ली है और करोड़ों की फसल को तहस-नहस कर डाला है। लेकिन पिछले एक माह से घटनाएं तो बढ़ी ही हैं, हाथियों के झुण्ड राज्य के नए इलाकों को भी अपनी चपेट मे ले रहे हैं। एक तरफ जंगली हाथी राज्य में जन-धन की हानि करते जा रहे हैं तो दूसरी तरफ सरकारें नित नई योजना बनाकर समस्या सुलझाने का प्रयास करती रही हैं, जमीनी सच्चाई यह है कि अभी तक कोई भी सरकारी कोशिश पीड़ितों को राहत नहीं दिला पायी है। जहां एक ओर सरकार मुआवजा बांटकर अपनेर् कत्तव्य की इतिश्री कर रही हैं वहीं दूसरी ओर लोग भय और आतंक के साये में रतजगा करने को मजबूर हैं।

छत्तीसगढ़ में जंगली हाथियों की समस्या मुख्यत: राज्य के उत्तरी और उत्तर पूर्वी इलाकों में है, यह इलाका झारखण्ड और उड़ीसा की सीमा से लगा हुआ है, जहां से हाथी राज्य में प्रवेश करते हैं, यह विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र है। हाथी समस्या के मूल में दो कारण हैं पहला यह कि पड़ोसी राज्यों में अत्यधिक बढ़ता खनन और वनों का दोहन जिससे जंगलों में रहने वाले हाथी अपने घरों (जंगल) से बेघर हो रहे हैं और वनों से आच्छादित छत्तीसगढ़ की ओर अपना रूख कर रहे हैं, दूसरा कारण यह है कि राज्य के इन ग्रामीण क्षेत्र में महुआ से शराब बनाई जाती है, महुआ की महक से हाथी बस्तियों की ओर खिंचे चले आते हैं और मादकता के खुमार में हिंसक हो जाते हैं।
अविभाजित मध्यप्रदेश के समय पहली बार 1993 में कर्नाटक से आये विशेषज्ञों की सहायता से ''ऑपरेशन जम्बो'' में 14 हाथियों को पकड़ा गया, जिन्हें बाद में म.प्र. और छत्तीसगढ़ के विभिन्न राष्ट्रीय उद्यानों और अभ्यारण्यों में रखकर पर्यटन की दृष्टि से उपयोग में लाया गया। वर्ष 2000 में पड़ोसी राज्यों झारखंड और उड़ीसा से दोबारा हाथियों का प्रवेश प्रारंभ हो गया जिसकी संख्या बाद के वर्षों में बढ़ती ही गई। 2005 के अंत तक राज्य में जंगली हाथियों की संख्या 123 तक पहुंच गई, समस्या से राज्य के 450 से अधिक गांव प्रभावित हैं।
यूं तो इस समस्या के समाधान के लिए पूर्व में कई बार शासन स्तर पर प्रयास हुए, लेकिन राज्य निर्माण के बाद वर्ष 2003 में जब प्रदेश में अजीत जोगी की सरकार थी तब वन विभाग ने हाथी विशेषज्ञ पार्वती बरूआ को बुलाया था, जिन्हें असम में कई जंगली हाथियों को काबू में करने का अनुभव था। उनके निर्देशन में 'घेरा डालो अभियान' शुरू किया गया जिसमें एक हाथी की मृत्यु हो गई। उन दिनों कुल 32 हाथी अलग-अलग दल बनाकर उत्पात मचा रहे थे। हाथी की मौत के बाद यह मामला विधानसभा में भी गूंजा। इसके बाद वर्ष 2005 में भाजपा शासनकाल के समय मुख्य, वन्य प्राणी अभिरक्षक ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अधीन चलने वाली हाथी परियोजना में छत्तीसगढ़ को भी शामिल करने के लिए परियोजना निदेशक को पत्र लिखा। इसके तहत केंद्र राज्यों को वित्तीय एवं तकनीकी सहायता मुहैया कराता है, यह परियोजना पूर्व से 13 राज्यों में लागू थी। पत्र का जवाब देते हुए परियोजना निदेशक ने राज्य को प्रस्ताव में आवश्यक सुधार कर दोबारा भेजने का निर्देश दिया। राज्य की ओर से भारत सरकार को दोबारा प्रस्ताव भेजकर तीन हाथी रिजर्व को विकसित करने की सहायता मांगी गई, तीन हाथी रिजर्वस में बादलखोल, तमोर पिंगला और लेमरू हाथी रिजर्व शामिल है। हालांकि बाद में भारत सरकार ने राज्य को हाथी परियोजना में शामिल कर लिया, लेकिन जैसा कि प्रदेश शासन ने सोचा था कि इससे समस्या सुलझ जाएगी वैसा नहीं हुआ, समस्या सुलझने की बजाय और भी उलझ गई है। राज्य सरकार को समझ नहीं आ रहा है कि वह समाधान के प्रयास किस दिशा में करें। शासन द्वारा इस दिशा में कई विशेषज्ञों का भी सहयोग लिया गया। वर्ष 2006 में अर्थ मैटर्स फाउन्डेशन के प्रमुख माईक पाण्डेय ने हाथियों की समस्या से निपटने के लिए मुख्यमंत्री के समक्ष तीन सूत्रीय प्रस्ताव रखा जिसके तहत हाथी रिजर्व विकसित करना जहां पर शोध और पर्यटन को बढ़ावा दिया जाएगा। दूसरा प्रस्ताव वृध्द एवं थके या बीमार हाथियों की शरणस्थली के तौर पर हाथी गांव विकसित करना जिसमें हाथी और महावत एक साथ रहेंगे, तीसरा और आखिरी प्रस्ताव यह था कि समस्या पैदा करने वाले हाथियों को पकड़कर सुदूर भेज दिया जाए।
पिछले एक माह से सरगुजा संभाग के कई इलाकों में जंगली हाथियों द्वारा कहर बरपाने की घटनाओं में तेजी आयी है, हाथियों के कई दलों ने गांवों में अचानक हमला कर जन-धन को भारी क्षति पहुंचायी है। रामानुजनगर में एक बच्ची को पटककर मारे जाने की घटना हो या लखनपुर क्षेत्र में कई एकड़ फसल को तहस-नहस करना, समस्या प्रभावित सभी जिलों में लोग भय और आतंक के बीच दिन काटने को मजबूर हैं। वहीं सरकारी कवायदों का फौरी लाभ फिलहाल पीड़ितों को नहीं मिला है और न ही निकट भविष्य में इसकी कोई संभावना नजर आती है। इस बीच खबर आई है कि वन मंत्री विक्रम उसेण्डी कर्नाटक के दौरे पर जाने वाले हैं, जहां वह हाथी समस्या के स्थायी समाधान के लिए अध्ययन करेंगे।

हाथियों से जानमाल के नुकसान से बचाव के लिए जंगलों में उनके लिए आहार शृंखला का विकास सबसे अहम् है, जिस पर काम चल रहा है। यह प्रोजेक्ट एलीफैन्ट का ही एक हिस्सा है। आहार के लिए हाथी जंगलों से बाहर निकल रहे हैं। यदि उन्हें पूरा आहार मिल जाए तो वे जंगलों से बाहर नहीं आएंगे। धान की फसल तैयार होने के समय उनका आबाद क्षेत्रों में प्रवेश की घटनाएं आहार के लिए ही बढ़ जाती है। हाथियों के आबाद क्षेत्रों में प्रवेश से रोकने के लिए हल्ला पार्टियों का गठन किया गया है और सुरक्षा एहतियात के प्रति लोगों को जागरूक करने के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। सरगुजा के सीएफ वाइल्ड लाइफ सेट्टी पनवर ने बताया कि पूरे सरगुजा सर्कल में जिसमें सरगुजा, कोरिया और जशपुर जिले आते हैं, चार दलों में 80 हाथी विचरण कर रहे हैं। आम तौर पर हाथियों के आने-जाने को रास्ता निश्चित होता है
इसलिए ऐसे रास्तों को चिन्हित कर जानमाल के नुकसान से बचाव की योजनाएं तैयार की गई हैं। ऐसे मार्गों पर हल्ला पार्टियों का गठन किया गया है और लोगों को सुरक्षा एहतियात के प्रति जागरूक करने के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि हाथियों की समस्या के स्थायी हल के लिए जंगलों में उनके लिए आहार शृंखला के विकास की जरूरत है। हाथी जंगलों में रहना पसंद करते हैं। यदि उन्हें पर्याप्त आहार जंगल में ही मिल जाएं तो वे बाहर गांवों का रूख नहीं करेंगे। इस पर काम चल रहा है, जो प्रोजेक्ट एलीफैंट का ही एक हिस्सा है। इसके परिणाम आने वाले वर्षों में दिखाई देंगे। आहार शृंखला के विकास का यह कार्यक्रम दस वर्षों में पूरा होगा। हल्ला पार्टी के अलावा हर डिवीजन में ट्रेकर पार्टी भी बनाई गई है, जो हाथियों के दल पर नजर रखती है और आबाद क्षेत्र में घुसने की संभावना पर लोगों को सतर्क करने तथा उसकी सूचना मुख्यालय में देने का काम कर रही है। उन्होंने बताया कि ये सारा काम योजनाबध्द ढंग से चल रहा है और इनसे जानमाल के नुकसान को काम करने में मदद मिली है।